25 जून का वो ‘काला सच’: बीजेपी की प्रेस वार्ता में जब गूंजा ‘गाय और बछड़ा’ का पुराना किस्सा, जानें क्या है पूरा विवाद?
रायगढ़ 25 जून 1975 की वो रात, जिसने आजाद भारत के लोकतंत्र पर सबसे बड़ा दाग लगाया था—यानी ‘आपातकाल’ (Emergency)। आज उसी काले दौर की बरसी पर देश भर में राजनीतिक पारा चढ़ गया है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने देश के अलग-अलग हिस्सों में विरोध प्रदर्शन करते हुए एक बेहद अनोखी और सांकेतिक प्रेस वार्ता की। लेकिन इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में कुछ ऐसा हुआ, जिसने सोशल मीडिया से लेकर सियासी गलियारों तक हलचल मचा दी है।
बीजेपी प्रवक्ताओं ने आपातकाल के क्रूर दौर को याद करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को ‘गाय’ और उनके बेटे संजय गांधी को ‘बछड़ा’ कहकर संबोधित किया। इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है कि क्या ऐसा कहना उचित है? आइए जानते हैं इस तीखे तंज के पीछे का वो इतिहास, जिसे आज की पीढ़ी शायद नहीं जानती।
## गाली या इतिहास? ‘गाय-बछड़ा’ बयान के पीछे का असली सच
पहली बार सुनने में यह बयान किसी व्यक्तिगत टिप्पणी जैसा लगता है, लेकिन इसके तार भारत के राजनैतिक इतिहास से जुड़े हैं:
* **कांग्रेस का पुराना चुनाव चिह्न:** साल 1969 में जब कांग्रेस दो धड़ों में टूट गई, तब इंदिरा गांधी की कांग्रेस को चुनाव आयोग से **’गाय और बछड़ा’** का चुनाव चिह्न मिला था। 1971 का लोकसभा चुनाव और 1975 का आपातकाल इसी सिंबल के साए में गुजरा था। (हाथ का पंजा बहुत बाद में, 1977-78 के आसपास आया)।
* **संजय गांधी का बढ़ता दखल:** आपातकाल के दौरान संजय गांधी के पास कोई संवैधानिक पद नहीं था, फिर भी देश के सारे बड़े फैसले—चाहे वो जबरन नसबंदी हो या प्रेस पर सेंसरशिप—उन्हीं के इशारे पर हो रहे थे।
* **विपक्ष का पुराना नारा:** उस दौर में भी विपक्षी दल जेपी आंदोलन के दौरान जनता को समझाने के लिए नारा लगाते थे कि यह ‘गाय और बछड़े’ की सरकार है, जहाँ गाय सत्ता पर बैठी है और बछड़ा पर्दे के पीछे से सरकार चला रहा है।
बीजेपी ने आज इसी ऐतिहासिक संदर्भ को दोबारा जिंदा करते हुए कांग्रेस के ‘वंशवाद’ और आपातकाल की तानाशाही पर अब तक का सबसे तीखा हमला बोला है।
## आपातकाल के वो 21 महीने: जब थम गई थी देश की सांसें
प्रेस वार्ता के दौरान बीजेपी नेताओं ने आंकड़ों के साथ याद दिलाया कि क्यों 1975 का वो फैसला भारत के इतिहास का सबसे क्रूर फैसला था:
| आपातकाल के काले आंकड़े | प्रभाव और दमन |
|—|—|
| **नेताओं की गिरफ्तारी** | जयप्रकाश नारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी सहित **1,10,000 से ज्यादा** लोग जेल में ठूंसे गए। |
| **सेंसरशिप** | अखबारों की बिजली काट दी गई। कुछ भी छापने से पहले सरकार की मंजूरी अनिवार्य थी। |
| **संविधान में बदलाव** | नागरिकों के मौलिक अधिकार (Fundamental Rights) छीन लिए गए और न्यायपालिका को पंगु बना दिया गया। |
## क्या यह बयान उचित है? (संपादकीय दृष्टिकोण)
राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि लोकतंत्र में भाषा की मर्यादा सर्वोपरि है, लेकिन जब बात ऐतिहासिक प्रतीकों की हो, तो दल एक-दूसरे को घेरने के लिए पुराने पन्नों का इस्तेमाल करते हैं। बीजेपी का यह बयान इंदिरा गांधी या संजय गांधी पर कोई व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं, बल्कि उस दौर के ‘सिंबल’ का इस्तेमाल करके आज की कांग्रेस को घेरने की एक सोची-समझी रणनीति है। इसके जरिए बीजेपी जनता को याद दिलाना चाहती है कि जिस पार्टी का इतिहास ‘गाय-बछड़ा’ (मां-बेटा) के वंशवाद से शुरू हुआ था, उसकी नीतियां आज भी नहीं बदली हैं।
यह खबर आज सोशल मीडिया पर टॉप ट्रेंड्स में है, क्योंकि यह न सिर्फ आज की राजनीति को गर्माती है, बल्कि युवाओं को 1975 के उस दौर में ले जाती है जिसके बारे में आज की पीढ़ी सिर्फ किताबों में पढ़ती है।






